भारत और पाकिस्तान की सरहद पर बढ़े तनाव और चीन के साथ हाल के दिनों में बढ़ी तल्खी के बीच सरकार 200 लड़ाकू विमानों की बड़ी खरीद की तैयारी में है। वायुसेना के सूत्रों के मुताबिक अगर डील तय हो गई तो लडाकू विमान की संख्या 300 या उससे भी अधिक हो सकती है। हालांकि, विदेशी निर्माताओं के सामने सरकार ने साफ कर दिया है कि विमान मेड इन इंडिया ही होनी चाहिए।एयर फोर्स सूत्रों के अनुसार सुरक्षाबलों के आधुनिकीकरण और लड़ाकू क्षमता में तेजी से विस्तार के लिए प्रस्ताव तैयार किए जा रहे हैं लेकिन मेड इन इंडिया की शर्त सबसे ऊपर रखी जाएगी। भारत के सामने न केवल पाकिस्तान बल्कि चीन की भी चुनौती है ऐसे में मोदी सरकार डिफेंस सेक्टर में खरीद और उत्पादन को लेकर तेजी से फैसले करना चाहती है।
मोदी सरकार की सोच।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चाहते हैं कि अब सैन्य विमान भारत में ही बने हुए हो। इसमें भारतीय कंपनी भी साझेदार हो। इससे घरेलू एयरक्राफ्ट उद्योग और निर्यात को मदद मिले। अमेरिकी लड़ाकू विमान निर्माता कहीड मार्टिन कंपनी भारत में एफ-16 विमानों की निर्माण यूनिट लगाने में रूचि दिखा रही है। उसका कहना है कि वह ना केवल भारत बल्कि निर्यात के लिए भी काम करेगी। स्वीडन की साब ने भी अपने ग्रिपेन एयरक्राफ्ट की निर्माण यूनिट लगाने का प्रस्ताव दिया है। रक्षा मंत्रालय ने कई कंपनियों को भारत में सिंगल इंजन फाइटर प्लेन के लिए असेंबली लाइन लगाने के लिए पूछा है। भारतीय वायुसेना के पास 32 ऑपरेशनल स्क्वाड्रन है जबकि जरुरत 45 स्कवाड्रन की है। इसके चलते पाकिस्तान और चीन के साथ भारत एक साथ नहीं लड़ सकता। वायुसेना भी इस बात को मान चुकी है।
मिग विमान लगातार दुर्घटना के शिकार होते रहे हैं।
भारत में अब तक ज्यादातर लड़ाकू विमान सोवियत संघ रूस से लिए गए हैं। हालांकि, हाल के दिनों में मिग विमान लगातार दुर्घटना के शिकार होते रहे हैं। अब एयरफोर्स के बेड़े को पूरी तरह बदलने की तैयारी है। 36 राफेल विमानों के लिए हुई डील इस दिशा में एक बड़ा कदम है। लेकिन अब सरकार इससे भी आगे जाकर सिंगल इंजन वाले 200 लड़ाकू विमानों की खरीद की तैयारी कर रही है। बस विदेशी कंपनियों के सामने शर्त ये होगी कि विमान भारत में बने। मोदी सरकार का जोर मेक इन इंडिया पर है। चीन और पाकिस्तान से मुकाबले के लिए एयरफोर्स को पूरी ताकत देने के लिए सरकार बड़ा फैसला लेने जा रही है।
जानिए क्या थी सच्चाई!
लंबे समय से ये सवाल उठ रहा था कि भारत अपनी रक्षा जरूरतों के हिसाब से निर्माण क्यों नहीं करता। इस दिशा में केवल तेजस जैसे हल्के लड़ाकू विमानों का निर्माण देश में होता है। भारतीय एयरफोर्स को 45 ऑपरेशनल स्क्वॉड्रन की जरूरत है लेकिन अभी 32 ही ऑपरेशन हैं। मार्च माह में रक्षा मामलों की संसदीय समिति के सामने वाइस चीफ एयर मार्शल बीएस धनोवा ने कहा था कि अगर पाकिस्तान और चीन के साथ एक साथ युद्ध की स्थिति आती है तो भारतीय वायुसेना के पास जरूरी क्षमता का संकट है। स्वीडन की ग्रिपेन एयरक्राफ्ट कंपनी भी इस डील में दिलचस्पी दिखा रही है। साब ने कहा है कि वह ना सिर्फ भारत में विमान के उत्पादन पर राजी है बल्कि वो भारत के एविएशन सैक्टर को भी मजबूत करने में मदद करेगी।

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